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شنيدم سامره آماج غم شد | |
اسير كينه و ظلم و ستم شد |
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شنيدم سامره شد غرق ماتم | |
نشسته خون به قلب قطب عالم |
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دريغا بارگاه عسگريين | |
امامين همامين شريفين |
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شده ويران به دست قوم خونخوار | |
گروه ناجوانمرد ستمكار |
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روا باشد كه اشك خون بباريم | |
فغان از سينه و از دل برآريم |
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دريغا اى دريغا اى دريغا | |
كه شد آزرده خاطر صاحب ما |
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همان شيطان پرستانى كه پستند | |
دل مهدى زهرا را شكستند |
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فداى ديدگان اشكبارش | |
به قربان دل خونين و زارش |
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اَلا اى خسرو خوبان عالم ! | |
دلت هرگز نگردد خانه غم |
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تو را مى گويم اى محبوب داور! | |
نگردد خاطرات هرگز مكدّر |
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تو آرام دل ما شيعيانى | |
چراغ افروز بزم عاشقانى |
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الهى خصم غدّارت بميرد | |
گل رويت غبار غم نگيرد |
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بيا مولا جهان در انتظار است | |
بيا مهدى كه دل ها بى قرار است |
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بيا اى مرد ميدان عدالت ! | |
درآور ريشه ظلم و ضلالت |
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بيا با ذوالفقار مرتضايى | |
بپا كن پرچم عدل خدايى |
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بيا با نغمه ((الله اكبر)) | |
بگير از روسياهان داد مادر |
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بيا اى دشمن دنياپرستان ! | |
فدك را باز بستان از پليدان |
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بيا آقا كه وقت انتقام است | |
بيا هنگام شمشير و قيام است |
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يقين دان ((محسن صافى )) كه يزدان | |
زند آتش به جان كينه توزان |