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اين بانگ طراق چوب ما را | |
دانيم كه از فراق خيزد |
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آن كس كه ز جان خود نترسد | |
از كشتن نيك و بد نترسد |
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وان كس كه بديد حسن يوسف | |
از حاسد و از حسد نترسد | |
آن كس كه هواى شاه دارد | |
از لشكر بى عدد نترسد | |
آخر حيوان ز ذوق صحبت | |
از جفته و از لگد نترسد | |
آن كس كه سعادت ازل ديد | |
از عاقبت ابد نترسد | |
چون كوه احد دلى ببايد | |
تا او ز جز احد نترسد | |
مرغى كه ز دام نفس خود رست | |
هر جاى كه برپرد نترسد | |
هر جاى كه هست گنج گنجست | |
كشته احد از لحد نترسد | |
هر جانورى كز اصل آبست | |
گر غرقه شود عمد نترسد | |
هر تن كه سرشته بهشتست | |
بر دوزخ برزند نترسد | |
وان را كه مدد از اندرونست | |
زين عالم بى مدد نترسد | |
از ابلهيست نى شجاعت | |
گر جاهل از خرد نترسد | |
خود سر نبدست آن خسى را | |
كز عشق تو پا كشد نترسد | |
اين مايه لعنتست كابله | |
دل هاى شهان خلد نترسد | |
هم پرده خويش مى درد كو | |
پرده من و تو درد نترسد | |
پازهر چو نيستش چرا او | |
زهر دنيا خورد نترسد | |
در حضرت آن چنان رقيبى | |
در شاهد بنگرد نترسد | |
زنهار به سر برو بدان ره | |
كان جا دلت از رصد نترسد | |
صراف كمين درست و آن دزد | |
از كيسه درم برد نترسد | |
آن جا گرگان همه شبانند | |
آن جا مردى ز صد نترسد | |
آن جا من و تو و او نباشد | |
چون وام ز خود ستد نترسد | |
هرگز دل تو ز تو نرنجد | |
هرگز ذقنت ز خد نترسد | |
گلشن ز بهار و باغ سوسن | |
وز سرو لطيف قد نترسد | |
چون گل بشكفت و روى خود ديد | |
زان پس ز قبول و رد نترسد | |
بس كن هر چند تا قيامت | |
اين بحر گهر دهد نترسد |
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آن جا كه چو تو نگار باشد | |
سالوس و حفاظ عار باشد |
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سالوس و حيل كنار گيرد | |
چون رحمت بى كنار باشد | |
بوسى به دغا ربودم از تو | |
اى دوست دغا سه بار باشد | |
امروز وفا كن آن سوم را | |
امروز يكى هزار باشد | |
من جوى و تو آب و بوسه آب | |
هم بر لب جويبار باشد | |
از بوسه آب بر لب جوى | |
اشكوفه و سبزه زار باشد | |
از سبزه چه كم شود كه سبزه | |
در ديده خيره خار باشد | |
موسى ز عصا چرا گريزد | |
گر بر فرعون مار باشد | |
بر فرعونان كه نيل خون گشت | |
بر مومن خوشگوار باشد | |
هرگز نرمد خليل ز آتش | |
گر بر نمرود نار باشد | |
يعقوب كجا رمد ز يوسف | |
گر بر پسرانش بار باشد | |
آن باد بهار جان باغست | |
بر شوره اگر غبار باشد | |
زان باغ درخت برگ يابد | |
اشكوفه بر او سوار باشد | |
احمد چو تو راست پس ز بوجهل | |
عشقا سزدت كه عار باشد | |
اين را بر دست و آن بدين مات | |
كار دنيا قمار باشد | |
آن كس كه ز بخت خود گريزد | |
بگريخته شرمسار باشد | |
هين دام منه به صيد خرگوش | |
تا شير تو را شكار باشد | |
اى دل ز عبير عشق كم گوى | |
خود بو برد آن كه يار باشد |
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اى كز تو همه جفا وفا شد | |
آن عهد و وفاى تو كجا شد |
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با روى تو سور شد عزاها | |
بى روى تو سورها عزا شد | |
شد بى قدمت سرا خرابه | |
باز از تو خرابه ها سرا شد | |
از دعوت تو فنا شود هست | |
وز هجر تو هست ها فنا شد | |
اى كشته مرا به جرم آنك | |
از من راضى به جان چرا شد | |
آن تخم عطاى تست در جان | |
كو را كف دست باسخا شد | |
اعنات مهيجست جان را | |
ور نى ز چه روى جان گدا شد | |
گر عاشق داد نيست جودت | |
پس جان ز چه عاشق دعا شد | |
زد پرتو ساقييت بر ابر | |
كز عكس تو ابرها سقا شد | |
زد عكس صبورى تو بر كوه | |
تسكين زمين و متكا شد | |
زد عكس بلندى تو بر چرخ | |
معنى تو صورت سما شد | |
از حسن تو خاك هم خبر يافت | |
شد يوسف خوب و دلربا شد | |
از گفت بدار چنگ كز وى | |
بى گفت تو فهم بانوا شد |
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روزم به عيادت شب آمد | |
جانم به زيارت لب آمد |
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از بس كه شنيد ياربم چرخ | |
از يارب من به يارب آمد | |
يار آمد و جام باده بر كف | |
زان مى كه خلاف مذهب آمد | |
هر بار ز جرعه مست بودم | |
اين بار قدح لبالب آمد | |
عالم به خمار اوست معجب | |
پس وى چه عجب كه معجب آمد | |
بر هر فلكى كه ماه او تافت | |
خورشيد كمينه كوكب آمد | |
گويى مه نو سواره ديدش | |
كز عشق چو نعل مركب آمد | |
اين بس نبود شرف جهان را | |
كو روح و جهان چو قالب آمد | |
شاد آن دل روشنى كه بيند | |
دل را كه چه سان مقرب آمد | |
از پرتو دل جهان پرگل | |
زيبا و خوش و مودب آمد | |
هر ميوه به وقت خويش سر كرد | |
هر فصل چه سان مرتب آمد | |
بس كن كه به پيش ناطق كل | |
گوياى خمش مهذب آمد | |
بس كن كه عروس جان ز جلوه | |
با نامحرم معذب آمد | |
من بس نكنم كه بى دلان را | |
اين كلبشكر مجرب آمد | |
من بس نكنم به كورى آنك | |
اندر ره دين مذبذب آمد | |
خامش كه به گفت حاجتى نيست | |
چون جذب فرغت فانصب آمد | |
خود گفتن بنده جذب حقست | |
كز بنده به بنده اقرب آمد |
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آن يوسف خوش عذار آمد | |
وان عيسى روزگار آمد |
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وان سنجق صد هزار نصرت | |
بر موكب نوبهار آمد | |
اى كار تو مرده زنده كردن | |
برخيز كه روز كار آمد | |
شيرى كه به صيد شير گيرد | |
سرمست به مرغزار آمد | |
دى رفت و پرير نقد بستان | |
كان نقد خوش عيار آمد | |
اين شهر امروز چون بهشتست | |
مى گويد شهريار آمد | |
مى زن دهلى كه روز عيدست | |
مى كن طربى كه يار آمد | |
ماهى از غيب سر برون كرد | |
كاين مه بر او غبار آمد | |
از خوبى آن قرار جان ها | |
عالم همه بى قرار آمد | |
هين دامن عشق برگشاييد | |
كز چرخ نهم نثار آمد | |
اى مرغ غريب پربريده | |
بر جاى دو پر چهار آمد | |
هان اى دل بسته سينه بگشا | |
كان گمشده در كنار آمد | |
اى پاى بيا و پاى مى كوب | |
كان سرده نامدار آمد | |
از پير مگو كه او جوان شد | |
وز پار مگو كه پار آمد | |
گفتى با شه چه عذر گويم | |
خود شاه به اعتذار آمد | |
گفتى كه كجا رهم ز دستش | |
دستش همه دستيار آمد | |
نارى ديدى و نور آمد | |
خونى ديدى عقار آمد | |
آن كس كه ز بخت خود گريزد | |
بگريخته شرمسار آمد | |
خامش كن و لطف هاش مشمر | |
لطفيست كه بى شمار آمد |
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برخيز كه ساقى اندرآمد | |
وان جان هزار دلبر آمد |
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آمد مى ناب وز پى نقل | |
بادام و نبات و شكر آمد | |
آن جان و جهان رسيد و از وى | |
صد جان جهان مصور آمد | |
مشك آمد پيش طره او | |
كان طره ز حسن بر سر آمد | |
زد حلقه مشك فام و مى گفت | |
بگشاى كه بنده عنبر آمد | |
از تابش لعل او چه گويم | |
كز لعل و عقيق برتر آمد | |
زان سنبل ابروش حياتم | |
با برگ و لطيف و اخضر آمد | |
درده مى خام و بين كه ما را | |
در مجلس خام ديگر آمد | |
آن رايت سرخ كز نهيبش | |
اسپاه فرج مظفر آمد | |
هر كار كه بسته گشت و مشكل | |
آن كار بدو ميسر آمد | |
مى ده كه سر سخن ندارم | |
زيرا كه سخن چو لنگر آمد |
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جان از سفر دراز آمد | |
بر خاك در تو بازآمد |
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در نقد وجود هر چه زر بود | |
از گنج عدم به گاز آمد | |
بى مهر تو هر كه آسمان رفت | |
درهاى فلك فرازآمد | |
بى آبى خويش جمله ديدند | |
هرك از تو نه سرفراز آمد | |
جان رفت كه بى تو كار سازد | |
سوزيد و نه كارساز آمد | |
اندر سفرش بشد حقيقت | |
كو بى تو همه مجاز آمد | |
از گرد ره آمدست امروز | |
رحم آر كه پرنياز آمد | |
سر را ز دريچه اى برون كن | |
تا بيند كان طراز آمد | |
تا نعره عاشقان برآيد | |
كان قبله هر نماز آمد | |
از پيش تو رفت باز جانم | |
طبل تو شنيد و بازآمد | |
اى اهل رباط وارهيديت | |
كز خط خوشش جواز آمد | |
آن چنگ طرب كه بى نوا بود | |
رقصى كه كنون به ساز آمد | |
از سلسله نياز رستيد | |
كان بند هزار ناز آمد | |
ترك خر كالبد بگوييد | |
كان شاه براق تاز آمد | |
نور رخ شمس حق تبريز | |
عالم بگرفت و راز آمد |
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آن شعله نور مى خرامد | |
وان فتنه حور مى خرامد |
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شب جامه سپيد كرد زيرا | |
كان ماه ز دور مى خرامد | |
مستان شبانه را بشارت | |
ساقى به سحور مى خرامد | |
جان را به مثال عود سوزيم | |
كان كان بلور مى خرامد | |
آن فتنه نگر كه بار ديگر | |
با صد شر و شور مى خرامد | |
آن دشمن صبرهاى عاشق | |
در خون صبور مى خرامد | |
جانم به فداى آن سليمان | |
كو جانب مور مى خرامد | |
جز چهره عاشقان مبينيد | |
كان شاه غيور مى خرامد | |
در قالب خلق شمس تبريز | |
چون نفخه صور مى خرامد |
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امروز نگار ما نيامد | |
آن دلبر و يار ما نيامد |
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آن گل كه ميان باغ جانست | |
امشب به كنار ما نيامد | |
صحرا گيريم همچو آهو | |
چون مشك تتار ما نيامد | |
اى رونق مطربان همين گو | |
كان رونق كار ما نيامد | |
آرام مده تو ناى و دف را | |
ك آرام و قرار ما نيامد | |
آن ساقى جان نگشت پيدا | |
درمان خمار ما نيامد | |
شمس تبريز شرح فرما | |
چون فصل بهار ما نيامد |
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خوش باش كه هر كه راز داند | |
داند كه خوشى خوشى كشاند |
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شيرين چو شكر تو باش شاكر | |
شاكر هر دم شكر ستاند | |
شكر از شكرست آستين پر | |
تا بر سر شاكران فشاند | |
تلخش چو بنوشى و بخندى | |
در ذات تو تلخيى نماند | |
گويى كه چگونه ام خوشم من | |
گويم ترشم دلت بماند | |
گويد كه نهان مكن وليكن | |
در گوشم گو كه كس نداند | |
در گوش تو حلقه وفا نيست | |
گوش تو به گوش ها رساند |
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ساقى زان مى كه مى چريدند | |
بفزاى كه ياركان رسيدند |
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مهمان بفزود مى بيفزا | |
زان خنب كه اوليا چشيدند | |
زان مى كه ز بوش جمله ابدال | |
در خلق پديد و ناپديدند | |
اى ساقى خوب شكرلله | |
كان روى نكوت را بديدند | |
اى آتش رخت سوز عشاق | |
در عشق تو رخت ها كشيدند | |
اى پرده فروكشيده بنگر | |
كز عشق چه پرده ها دريدند |
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اول نظر ار چه سرسرى بود | |
سرمايه و اصل دلبرى بود |
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گر عشق وبال و كافرى بود | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
آن جام شراب ارغوانى | |
وان آب حيات زندگانى | |
وان ديده بخت جاودانى | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
جمعيت جان هاى خرم | |
در سايه آن دو زلف درهم | |
در مجلس و بزم شاه اعظم | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
از رنگ تو گشته ايم بى رنگ | |
زان سوى جهان هزار فرسنگ | |
آن دم كه بماند جان ما دنگ | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
در عشق پديد شد سپاهى | |
در سايه چتر پادشاهى | |
افتاده دلم ميان راهى | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
همچون مه نو ز غم خميدن | |
چون سايه به رو و سر دويدن | |
از عالم دل ندا شنيدن | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
آن مه كه بسوخت مشترى را | |
بشكست بتان آزرى را | |
گر دل بگزيد كافرى را | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
گر هجده هزار عالم اى جان | |
پر گشت ز قال و قال اى جان | |
وان شعله نور حالم اى جان | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
گر داد طريق عشق داديم | |
ور زان مه و آفتاب شاديم | |
ور ديده نو در او گشاديم | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
آن دم كه ز ننگ خويش رستيم | |
وان مى كه ز بوش بود مستيم | |
وان ساغرها كه درشكستيم | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
باغى كه حيات گشت وصلش | |
خوشتر ز بهار و چار فصلش | |
شمس تبريز اصل اصلش | |
آخر نه به روى آن پرى بود |
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اول نظر ار چه سرسرى بود | |
سرمايه و اصل دلبرى بود |
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گر عشق وبال و كافرى بود | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
زان رنگ تو گشته ايم بى رنگ | |
زان سوى خرد هزار فرسنگ | |
گر روم گزيد جان اگر زنگ | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
رو كرده به چتر پادشاهى | |
وز نور مشارقش سپاهى | |
گر ياوه شد او ز شاهراهى | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
همچون مه بى پرى پريدن | |
چون سايه به رو و سر دويدن | |
چون سرو ز بادها خميدن | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
زان مه كه نواخت مشترى را | |
جان داد بتان آزرى را | |
گر سهو فتاد سامرى را | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
گر هجده هزار عالم اى جان | |
پر گشت ز قال و قالم اى جان | |
گر حالم وگر محالم اى جان | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
چون ماه نزارگشته شاديم | |
كاندر پى آفتاب راديم | |
ور هم به خسوف درفتاديم | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
ناموس شكسته ايم و مستيم | |
صد توبه و عهد را شكستيم | |
ور دست و ترنج را بخستيم | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
زان جام شراب ارغوانى | |
زان چشمه آب زندگانى | |
گر داد فضوليى نشانى | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
فصلى بجز اين چهار فصلش | |
نى فصل ربيع و اصل اصلش | |
گر لاف زديم ما ز وصلش | |
آخر نه به روى آن پرى بود | |
خاموش كه گفتنى نتان گفت | |
رازش بايد ز راه جان گفت | |
ور مست شد اين دل و نشان گفت | |
آخر نه به روى آن پرى بود |
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دير آمده اى سفر مكن زود | |
اى مايه هر مراد و هر سود |
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اى ز آتش عزم رفتن تو | |
از بينى ها برآمده دود | |
هر عود تلف شود ز آتش | |
در آتش توست عيد هر عود | |
اوميد تو هر دمى بگويد | |
دستت گيرم به فضل خود زود | |
اما تو مگو كه جهد و كوشش | |
سودم نكند كه بودنى بود | |
معزول مكن تو قدرتم را | |
من بسته نيم چو تار در پود | |
هر لحظه بكاهمت چو خواهم | |
وز فضل توانمت بيفزود | |
بربند دهان ز گفت و سر نه | |
در سجده دوست كوست مسجود |
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آن كس كه به بندگيت آيد | |
با او تو چنين كنى نشايد |
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اى روى تو خوب و خوى تو خوش | |
چون تو گهرى فلك نزايد | |
روى تو و خوى تو لطيفست | |
سر دل تو لطيف بايد | |
آن شخص كه مردنيست فردا | |
امروز چرا جفا نمايد | |
چيزى كه به خود نمى پسندد | |
آن بر دگرى چه آزمايد | |
از خشم مخاى هيچ كس را | |
تا خشم خدا تو را نخايد | |
برخيز ز قصد خون خلقان | |
تا بر سر تو فرونيايد | |
آن گاه قضا ز تو بگردد | |
كان وسوسه در دلت نيايد | |
اى گفته كه مردم اين چه مرديست | |
كابليس تو را چنين بگايد |
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آخر گهر وفا بباريد | |
آخر سر عاشقان بخاريد |
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ما خاك شما شديم در خاك | |
تخم ستم و جفا مكاريد | |
بر مظلومان راه هجران | |
اين ظلم دگر روا مداريد | |
اى زهره ييان به بام اين مه | |
بر پرده زير و بم بزاريد | |
يا نيز شما ز درد دورى | |
همچون من خسته دلفكاريد | |
محروم نماند كس از اين در | |
ما را به كسى نمى شماريد | |
آن درد كه كوه از او چو ذرست | |
بر ذرگكى چه مى گماريد | |
اى قوم كه شيرگير بوديت | |
آن آهو را كنون شكاريد | |
زان نرگس مست شيرگيرش | |
بى خمر وصال در خماريد | |
زان دلبر گلعذار اكنون | |
بس بى دل و زعفران عذاريد | |
با اين همه گنج نيست بى رنج | |
بر صبر و وفا قدم فشاريد | |
مردانه و مردرنگ باشيد | |
گر در ره عشق مرد كاريد | |
چون عاشق را هزار جانست | |
بى صرفه و ترس جان سپاريد | |
جان كم نايد ز جان مترسيد | |
كاندر پى جان كامكاريد | |
عشقست حريف حيله آموز | |
گرد از دغل و حيل برآريد | |
در عشق حلال گشت حيله | |
در عشق رهين صد قماريد | |
حقست اگر ز عشق آن سرو | |
با جمله گلرخان چو خاريد | |
حقست اگر ز عشق موسى | |
بر فرعونان نفس ماريد | |
جان را سپر بلاش سازيد | |
كاندر كف عشق ذوالفقاريد | |
در صبر و ثبات كوه قافيد | |
چون كوه حليم و باوقاريد | |
چون بحر نهان به مظهر آيد | |
ماننده موج بى قراريد | |
هنگام نثار و درفشانى | |
چون ابر به وقت نوبهاريد | |
در تير شهيت اگر شهيديت | |
در پيش مهيت اگر غباريد | |
پاينده و تازه همچو سرويد | |
چون شاخ بلند ميوه داريد | |
ز آسيب درخت او چو سيبيد | |
چون سيب درخت سنگساريد | |
گر سنگ دلان زنندتان سنگ | |
با گوهر خويش يار غاريد | |
چون دامن در پيش دوانيد | |
گر همچو سجاف بر كناريد | |
چون همسفريد با مه خويش | |
پيوسته چو چرخ در دواريد | |
هم عشق شما و هم شما عشق | |
با اشتر عشق هم مهاريد | |
گر نقب زنست نفس و دزدست | |
آخر نه در اين حصين حصاريد | |
از عشق خوريد باده و نقل | |
گر مقبل وگر حلال خواريد |
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